इंडियन मुजाहिदीन पर सरकार श्वेत पत्र जारी करे

मालेगांव बम धमाकों,न्यायिक साम्प्रादायिकता और इंडियन मुजाहिद्दीन का सच विषयक सम्मेलन में आतंकवाद के मसलों पर न्यायपालिका की बढ़ती साम्प्रादायिक प्रवृत्ति पर चिंता जाहिर की गई। वहीं इंडियन मुजाहिद्दीन के अस्तित्व पर सवाल उठाने हुए वक्ताओं ने इस पर केंद्र सरकार से श्वेतपत्र जारी करने की मांग की।
प्रेस क्लब में आयोजित इस सम्मेलन में वरिष्ठ पत्रकार सुभाष गाताड़े ने पिछले दिनों मालेगांव बम धमाकों के दो अभियुक्तों कलसांगड़ा और साहू की जमानत पर सवाल उठाते हुए कहा कि जब न्यायपालिका इस बात को मानती है कि इन दोनों को मालेगांव विस्फोट के षड़यंत्र की जानकारी थी बावजूद इसके इनको छोड़ दिया गया। जबकि उसी मामले में असीमानंद की स्वीकारोक्ति के बावजूद अभी भी 9 मुस्लिम निर्दाेष बच्चे जेलों में बंद है। इसे न्यायिक साम्प्रादायिकता नहीं तो क्या कहा जायेगा। उन्होंने कहा कि सुब्रमण्यम स्वामी मुसलमानों से मताधिकार छीन लेने की बात करते हैं, बावजूद इसके न तो उनके खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई होती है और न ही अपने को सेकुलर कहने वाली केंद्र सरकार ने कुछ किया।
 
मैग्सेसे सम्मान प्राप्त सामाजिक कार्यकर्ता संदीप पाण्डेय ने कहा कि यह एक गंभीर सवाल है कि बाटला हाउस एनकाउंटर को सरकार अपनी उपलब्धि बताती है,जबकि सभी जांच रिपोर्ट व नागरिक समाज इसे फर्जी एनकाउंटर बताता है। इससे जाहिर है कि यह सरकार आतंकवाद के सवाल पर किस साम्प्रदायिक जेहनियत से सोचती है। उन्होंने कहा कि कानपुर में बजरंग दल के दो लोग बम बनाते हुए उड़ गये बावजूद इसके सरकार ने कोई गंभीर जांच नहीं कराई जबकि सिर्फ शक के आधार पर बिना किसी ठोस आधार पर सैकड़ों मुस्लिम नौजवान जेलों में बंद हैं।
वेलफेयर पार्टी ऑफ इंडिया के राष्ट्रीय अध्यक्ष मुस्तफा फारूक ने कहाकि  आतंकी विस्फोटों की राजनीति के मूल मंा मुसलमानों के खिलाफ सुनियोजित तरीके से पैदा किये गये अविश्वास की राजनीति से जुड़ा है। उन्होंने कहा कि एटीएस के आरोप के ही मुताबिक कर्नल पुरोहित ने एक हजार लोगों को विस्फोट करने की ट्रेनिंग दी। बावजूद इसके आज तक उनकी शिनाख्त इंटलिजेंस ने क्यों नहीं करवायी।
वरिष्ठ पत्रकार अजीत साही ने कहा कि जब राज्य की आतंकवाद में संलिप्तता उजागर हो रही है,जिसे गुजरात से लेकर तमाम जगहों पर देखा गया है,तो ऐसे में इंडियन मुजाहिद्दीन नाम के जिस संगठन के सहारे आतंकवाद का हौव्वा खड़ा किया गया है,जिसका कोई आधार नहीं है, की साजिश को ध्वस्त करने के लिए सिविल सोसायटी को एक राजनैतिक अभियान शुरू करने की जरूरत है। उन्होंने यह भी कहा कि इंडियन मुजाहिद्दीन नाम का कोई संगठन है कि नहीं या फिर यह खूफिया एजेसिंयों के द्वारा रचा गया संगटन है,इसकी जांच किये जाने की आवश्यकता है। पढना जारी रखे
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गर्म हवाः एक वक्त के उखड़ने और सूखने की दास्तां

शाहनवाज़ आलम

अगर थोडी देर के लिये इस बात को नजरअंदाज कर दिया जाये कि 1973 में एमएस सथ्यू द्वारा निदेर्शित फिल्म गर्म हवा को अंतराष्ट्रीय एकेडमी अवार्ड के लिये या केंस फिल्म महोत्सव के प्रतिष्ठित गोल्डेन पाल्म अवार्ड के लिये नामित किया गया था, या भारत में उसे आधा दर्जन पुरस्कार मिले, तब इस राजनीतिक फिल्म के महत्व और उसके कॉन्टेंट को समझना ज्यादा आसान होगा। ऐसा इसलिये कि अवार्ड विनिंग फिल्में अक्सर टे्ंड सेटर बन जाती हैं। यानी बाद के दौर में उन फिल्मों की नकल करने या उनके विषय वस्तु को उठा कर फिल्में बनाने का पूरा सिलसिला शुरू हो जाता है।
लेकिन ‘गर्म हवा’ अपने आप में इस ट्रेंड के विपरीत एक ऐसी फिल्म है जिसकी न तो नकल करने की ही कोशिश की गयी और ना उसके विषय वस्तु को ही छूने की कोशिश की गयी। इस तरह यह फिल्म, हिंदी फिल्म उद्योग, जो किसी भी अवार्ड विनिंग फिल्म की नकल बनाने के लिये जाना जाता है, की इस नकलची प्रवित्ति पर भी सवाल उठाती है कि क्या नकल भी सिर्फ उन्हीं फिल्मों की होती है जिनकी राजनीतिक दिशा राज्य सत्ता की नीतियों से मेल खाती है या जो उन्हीं सामाजिक स्टीरियोटाईप्स को मजबूत बनाती हैं जिसे सत्ता निर्मित और पोषित करती है।
इस्मत चुगताई की एक अप्रकाशित कहानी पर कैफी आजमी और शमा जैदी द्वारा लिखित और बलराज साहनी, फारूक शेख और शौकत आजमी अभिनित ‘गर्म हवा’ बंटवारे के बाद के भारत में रह गये एक मुसलमान परिवार की बदली हुयी राजनीतिक परिस्थितियों में पारिवारिक और सामाजिक विचलन की कहानी है। जो व्यक्तिगत होते हुये भी पूरे मुस्लिम समाज की स्थिति को बयान करती है। जिसको फिल्म के शुरूआती दृश्य में ही जब बलराज साहनी पाकिस्तान जाने वाले अपने एक और परिजन को ट्रेन पर चढा कर लौट रहे हैं से तांगे वाला (राजेंद्र रघुवंशी) कह कर स्थापित करता है कि ‘बडी गर्म हवा है मियां, जो उखडा नहीं सूख जावेगा मियां’। 
फिल्म सलीम मिर्जा (बलराज साहनी) जो आगरा के एक प्रतिष्ठित जूता कारखाने के मालिक हैं के परिवार के इसी गर्म हवा से आंतरिक और बाहरी संघर्ष की कहानी है। जहां आंतरिक तौर पर उनके परिवार के सदस्य एक-एक कर उखड के पाकिस्तान चले जा रहे हैं। जबकि सलीम मिर्जा को लगता है कि ‘गांधी जी की शहादत रायगा नहीं जायेगी’ और कुछ दिनों बाद सब कुछ ठीक हो जायेगा। सलीम मिर्जा अपने इसी विश्वास के चलते अपने भरे पूरे परिवार से बिछड कर सिर्फ अपनी मां, पत्नी, बेटी और बेटे के साथ रह जाते हैं। 
जबकि बाहरी समाज की वास्तविक दिशा उनके विश्वास के ठीक विपरीत है। और बंटवारे के दौरान दिखी मुस्लिम विरोधी शारीरिक हिंसा अब बहुत तेजी से संस्थागत रूप ले रही है। 
जहां एक मुस्लिम नौजवान (फारूक शेख) को नौकरी के लिये इंटरव्यू के दौरान कहा जाता है ‘आप यहां अपना समय बर्बाद कर रहे हैं, आप पाकिस्तान क्यूं नहीं चले जाते’ या किराये का मकान ढूंढ़ने वाले एक मुसलमान (बलराज साहनी) को मकान मालिक से पहले कहना पडता है कि ‘मेरा नाम सलीम मिर्जा है और मैं एक मुसलमान हूं, क्या आप मुझे मकान देंगे।’ सलीम मिर्जा परिवार के लिये स्थितियां उस समय और भयावह हो जाती हैं जब उन पर एक नक्शा पाकिस्तान भेजने और पाकिस्तान के लिये जासूसी करने का झूठा मुकदमा लाद दिया जाता है। 

गौरतलब है कि बंटवारे के बाद भारत में रह गये मुसलमानों को साम्प्रदायिक होते राज्य व्यवस्था द्वारा प्रताणित करने का यह सबसे आसान हथियार रहा है। जिसके चलते न जाने आज भी कितने निदोर्ष मुसलमान पाकिस्तान के लिये जासूसी करने के झूठे मामलों में जेलों में सडने के लिये मजबूर हैं। सम्भवतः भारतीय राज्य व्यवस्था द्वारा मुसलमानों के रूप में एक स्थाई आंतरिक शत्रु के निर्माण की इसी षडयंत्रकारी राजनीतिक परिघटना को चित्रित करने के चलते ही देश-विदेश में पुरस्कार हासिल करने वाली यह फिल्म कभी नकलची बालीवुड को अपनी विषय वस्तु ‘चुराने’ के लिये प्रेरित नहीं कर पायी। 
बहरहाल, मिर्जा परिवार के आंतरिक और बाहरी जद्दोजेहद के साथ ही फिल्म एक महिला के नजरिये से भी इन परिस्थितियों का जायजा लेती है। आमना (गीता सिद्धार्थ), जो सलीम मिर्जा की बेटी है की शादी पाकिस्तान जा चुके उसके चचेरे भाई काजिम मिर्जा (जमाल हाशमी) से तय है। पाकिस्तान से पढाई के लिये लंबे समय तक विदेश जाने से पहले काजिम आमना से शादी करने के लिये गैर कानूनी तरीके से भारत आ जाता है। लेकिन शादी से चंद रोज पहले ही पुलिस उसे पकड कर वापस पाकिस्तान भेज देती है। जिससे आमना पूरी तरह टूट जाती है। कुछ समय बाद स्थितियों से समझौता करके आमना अपनी जिंदगी में एक दूसरे लडके को आने देती है। लेकिन एक अमीर लडकी से शादी तय हो जाने के बाद वह उसे छोड़ देता है। पूरी तरह टूट चुकी आमना इस ‘गर्म हवा’ को बर्दाश्त नहीं कर पाती और आत्म हत्या कर लेती है। 
फिल्म सलीम मिर्जा परिवार के साथ की उस दौर के आम सामाजिक हालात को भी चित्रित करने में सफल रही है। जिसे बेरोजगार युवकोें के बहसों में बखूबी देखा जा सकता है। जहां किसी को सिर्फ इसलिये नौकरी नहीं मिल पाती कि उससे रिश्वत मांगा जाता है तो किसी को अंग्रेजी अच्छी नहीं होने के चलते बेकार बैठना पडता है। वहीं इन बेरोजगारों को मुफ्त में चाय पिलाने वाला दुकानदार उन आदर्शों का प्रतिनिधि है जिसकी बुनियाद पर आजादी की लडाई लडी गयी थी। दुकानदार, जो स्वतंत्रता सेनानी है का आजादी के बाद के हालात पर टिप्पणी है ‘मैं सत्याग्रह में शामिल हुआ, जेल गया, लाठियां खायीं लेकिन आजादी मिली तो मलाई कुत्ते खा रहे हैं।’ 
बहरहाल, भारतीय मुसलमानों की समस्या पर बनी अब तक की सबसे महत्वपूर्ण फिल्म समस्या का हल भी सुझाती है। और हल भी मुस्लिम केंद्रित नहीं बल्कि सेक्यूलर और प्रगतिशील। जिसके केंद्र में सलीम मिर्जा जैसे उम्र दराज लोग नहीं बल्कि चायखाने पर बैठने वाले बेरोजगार युवा हैं। जो बेरोजगारी, भूख और साम्प्रदायिक भेदभाव पर आधारित होती जा रही राजनीतिक व्यवस्था को जनवादी रास्ते पर ले आना चाहते हैं। जिनका नारा ‘इन्कलाब जिंदाबाद और रोजी-रोटी लाल निशान, मांग रहा है हिंदुस्तान’ है। 
अपनी मां और बेटी की मौत से टूट चुके सलीम मिर्जा, जो कभी पाकिस्तान जाने के सुझाव पर कहते थे कि ‘यह उम्र दुनिया छोड कर जाने की है वतन नहीं’, भी जब पाकिस्तान जाने के लिये तांगे से निकलते हैं तब यही नारा उनमें उम्मीद जगाता है। और फिल्म के आखिरी दृष्य में वे और उनका बेटा नारे लगाती उस भीड में शामिल हो कर अपनी ही जैसी तकलीफों की शिकार लोगों के जन सैलाब में खो जाते हैं। 
2005 में इंण्यिा टाईम्स मूवीज द्वारा बालीवुड की सर्वकालिक बेहतरीन 25 फिल्मों में शुमार ‘गर्म हवा’ के निर्माण से जुडी कहानी भी काफी दिलचस्प है। साम्प्रदायिकता जैसे राजनीतिक मुद्दे पर प्रगतिशील नजरिये से बनने के चलते फिल्म की शूटिंग के दौरान लोकेशन (आगरा) पर कई बार हिंदुत्वादी अराजक तत्वों ने अवरोध उतपन्न करने की कोशिश की। जिससे निपटने के लिये एमएस सथ्यू ने कई डमी यूनिट बनाईं जो अनलोडेड कैमरे के साथ वास्तविक लोकेशन से काफी दूर जा कर शूटिंग का नाटक करते थे। जिससे विरोध करने वालों का ध्यान बंट जाये और फिल्म की वास्तविक शूटिंग चलती रहे।
(मीडिया चार्टशीट से साभार)

मुम्‍बई की ‘स्पिरिट’ और भारत की आत्‍मा

मुंबई में हाल ही में हुए बम धमाकों के बाद सुब्रमणियम स्‍वामी ने डीएनए में सांप्रदायिक नजरिए से और घृणा फैलाने वाला एक लेख लिखा था, जिसका शीर्षक था ‘इस्‍लामी आतंकवाद का खात्‍मा कैसे किया जाए – एक विश्‍लेषण’. इस लेख पर प्रबुद्ध नागरिकों ने त्‍वरित एवं तीखी प्रतिक्रिया की। फिल्‍मकार राकेश शर्मा ने डीएनए में ही स्‍वामी के इस लेख का जवाब लिखा। हम अंग्रेजी में प्रकाशित इस लेख का हिंदी अनुवाद ‘बर्बरता के विरुद्ध’ के पाठकों के लिए प्रस्‍तुत कर रहे हैं।
हिंदुत्‍ववादी कट्टरपंथी ताक़ते अब स्‍वामी के समर्थन में उतर आई हैं और उनके के इस लेख को सही बताते हुए टिप्‍पणियां, पत्र, ईमेल आदि लिखने का अभियान  चला रखा है। सभी प्रगतिशील नागरिकों से अनुरोध है कि वे भी इस अभियान का जवाब दें और इस लेख के अंत में दिए गए लिंक, ईमेल पतों पर अपनी प्रतिक्रिया दर्ज कराएं।
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(17जुलाई 2011, रविवार को डी एन ए में प्रकाशित)
मुम्‍बई की ‘स्पिरिट’ और भारत की आत्‍मा
**राकेश शर्मा* *
-सुब्रमणियम स्‍वामी के घृणा फैलाने वाले लेख(डी एन ए, 16 जुलाई) का प्रत्‍युत्‍तर 

मैं जिस मुंबई शहर को दो दशकों से भी अधिक समय से अपना घर कहता हूँ,वहाँ इस सप्‍ताह हुए बम धमाकों के बाद मैंने भयाकुल होकर कई टीवी चैनल देखे,कई कर्कश सोशलाइटों, मौकापरस्‍त राजनेताओं औरसर्वज्ञाता टीवी एंकरों को पादरीनुमा ज्ञान बघारते सुना। हम सभी पर ऑनलाइन उन्‍माद, टीवी चैनलों के उपदेशों और 140 अक्षरों में हर जटिल समस्‍या का चटपटसमाधान बताने वाली भद्दी ‘ट्वीट्स’ की मानो बौछार हो गर्इ है। जांच-पड़ताल का कोईनिष्‍कर्ष निकलने से पहले ही अज्ञानी और विशेषज्ञ दोनों तरह के लोगों ने तरह-तरहके आक्रामक सुझाव दे डाले  पड़ोसी कोनेस्‍तनाबूद कर दो, बातचीत बंद करो,आतंकी ठिकानों को नष्‍ट करने के लिए हमला करो, बड़े पैमानेपर गिरफ्तारी के आदेश दो, हरेक नागरिकों पर निगरानी बढ़ाओ(ख़ासकर एक समुदाय विशेष के नागरिकों पर), पोटा को वापस लाओ, मुकदमों की त्‍वरित सुनवाई और फैसला करो, कसाब कोफांसी दो, अफ़ज़ल को फांसी दो आदि-आदि। 

प्रसिद्धिके भूखे नेता अपनी राजनीतिक रोटियाँ सेंकने के लिए नीतिगत विफलताओं, रीढ़विहीनसरकारों की कठोर विवेचनाओं और इस्‍तीफ़ों की माँग की रट लगाए हुए हैं। सुब्रमणियमस्‍वामी जैसे लोग हमें प्रेरित करते हैं कि हम आतंक की महाविपत्ति का जवाब हिन्‍दुओंकी तरह दें न कि भारतीयों की तरह, वो हमें आगाह करते हैं कि तालिबान हमारी चौखट तकआ गया है, वो अपने पुराने सिद्धांतों पर जमी धूल को साफ़ करके और पुन: चक्रित करकेहमें पेश करते हैं तथा हमें वस्‍तुत: हिन्‍दू तालिबान में रूपान्‍तरित होने की सलाहदेते हैं।     
इनमेंसे हरेक ऐसा भुक्‍तभोगियों के नाम पर करता है! अपनी राय, सिद्धांत और उपचारपेश करते वक्‍़त इनमें से हरेक शोकाकुल परिवारों के लिए आँसू बहाता है। पिछले 10वर्षों में नफ़रत की राजनीति और उसके फ़ौरी और दीर्घकालिक भीषण दुष्‍परिणामों परकेन्द्रित फिल्‍मों के निर्माता के तौर पर मैने ऐसे बहुतेरे लोगों को चित्रित कियाहै जिनकी आतंक और संगठित हिंसा के कृत्‍यों द्वारा दुनिया ही उजाड़ दी गयी है। S-6 मेंमारे गये लोगों के परिवारों की धुँधली तस्‍वीरें जिन पर बाद में ‘कारसेवक’ का ठप्‍पालगा दिया गया और जिनकी त्रासदियों को बेशर्मी से वोटों के लिए भुनाया गया एवं 2002के गुजरात नरसंहार में मुस्लिम परिवारों पर सबसे घृणित स्‍तर की बर्बरता और ज़ुल्‍मऐसी अनगिनत कहानियों में से हैं जिनके दस्‍तावेज़ मैंने बनाये हैं। मैंने 26/11 केआतंकी हमले के बाद के घटनाक्रम और उसके पहले 2006 में मुम्‍बई के सिलसिलेवार बमधमाकों को भी चित्रित किया है। मैंने ऐसे एक दर्जन मुस्लिम परिवारों से बातचीत कीहै जिनको कसाब द्वारा सी एस टी/ वी टी स्‍टेशन पर मारा गया था और बीसियों हिन्‍दू भुक्‍तभोगियोंका अस्‍पताल और उनके घरों में इण्‍टरव्‍यू लिया है। इण्डियन मुजाहिद्दीन केबमों से प्रभावित लोगों के साथ ही साथ मालेगांव में अभिनव भारत के बमों कादु‍ष्‍परिणाम भोगते लोगों की व्‍यथा भी मैंने अपने कैमरे में कैद की है। 
ऐसेसभी लोगों से जो इस समय ज़हर उगल रहे हैं और भुक्‍तभोगियों के नाम पर असहिष्‍णुताफैला रहे हैं, मैं यह कहना चाहता हूँ कि प्रभावित हिन्‍दू एवं मुस्लिम परिवारों केबीच हफ़्तों और महीनों बिताने के दौरान मुझे ऐसा एक भी व्‍यक्ति नहीं मिला जोअसहिष्‍णुता का पालन करता हो या फैलाता हो या दूसरी कौम के खिलाफ़ नफ़रत की भावनारखता हो। उनमें से सभी नफ़रत की भर्त्‍सना करते हैं, उनमें से एक भी ऐसा नहीं हैजो प्रत्‍यक्ष तौर पर या फिर उनके नाम पर बदले की ख्‍़वाहिश रखता हो। लेकिन उनमेंसे कोई भी इसको नहीं भूला है या फिर अपनी क्षति को दार्शनिक तौर पर स्‍वीकार करपाया है। निरपवाद रूप से अधिकांश में मैंने न्‍याय की एक प्रबल इच्‍छा देखी किदोषी को कड़ी से कड़ी सजा मिले तथा एक उत्‍कट कामना देखी कि किसी को भी ऐसीदुर्गति न झेलनी पड़े चाहे वह उनकी कौम का हो या फिर किसी भी कौम का हो। इंसाफ़शब्‍द मुझे हमेशा ही सुनाई दिया लेकिन नफ़रत कभी नहीं! कइयोंमें मैने आक्रोश देखा लेकिन निरपवाद रूप से उन लोगों के खिलाफ़ जो उनकी त्रासदियोंको भुनाते हैं, चाहे वह उनकी अपनी कौम के भ्रष्‍ट सदस्‍य हों जो राहत सामग्री मेंहेर फेर करते हैं या फिर ह्रदयहीन नौकरशाही और असंवेदनशील मीडिया रिपोर्टरों केखिलाफ़, लेकिन ज्‍़यादातर मामलों में नेताओं के खिलाफ़ जो उनकी त्रासदियों कोकुटिलता से भुनाने की कोशिश करते हैं। ‘हमारी लाश पर वोट की रोटी सेंकते हैं येलोग’ – मैंने हिन्‍दू और मुस्लिम दोनों ही भुक्‍तभोगियों को ऐसा कहते बार-बारसुना है।     
 मैंने उनके धैर्य,साहस,संवेदनशीलता और इंसानियत की भूरि-भूरि प्रशंसा कीहै। उनको सहिष्‍णुता का पाठ पढ़ाने की बजाय उल्‍टा मैंने उनसे सीखा है। मैंने इसेउनकी आँखों में देखा है, उनकी वाणी में सुना है, उनकी आवाज़ में महसूस किया है औरउनकी कार्रवाहियों में परिलक्षित होते देखा है। इसलिए मुझे यकीन है कि भले हीमुट्ठी भर कुछ ऐसे लोग हों जो नफ़रत और असहिष्‍णुता में विश्‍वास करते हों, लेकिनआम जनता और ‘भुक्‍तभोगी’ इसमें विश्‍वास नहीं करते और हमारे देश का सामाजिकताना-बाना और उसमें अन्‍तर्निहित सामाजिक लोकाचार तथा सौहार्दपूर्ण सह-अस्तित्‍वके मूल्‍य इतने मज़बूत हैं कि उनको नष्‍ट नहीं किया जा सकता है। इसलिए मैं अभी भीयह विश्‍वास करता हूँ कि नफ़रत की राजनीति कभी भी भारत में प्रतिनिधि और निर्णायकताकत नहीं बन सकती।
आजका दौर एक भयानक दौर है। एक नागरिक के तौर पर हम सभी एक गहरा आक्रोश, निराशा औरलाचारी महसूस करते हैं। ऐसे में धीरज खोना, संदर्भ से कट जाना और अप्रासंगिकजुमलेबाजियों की चपेट में आना आसान है। लेकिन यह आक्रामकता को बढ़ावा देने,राजनीतिक बहसबाजी और हालिया और मध्‍यकालीन इतिहास को फिर से लिखने या विश्‍लेषणकरने का समय नहीं है। यह हम सभी के एकजुट होने और उन सभी के खिलाफ़ एक ही सुर मेंआवाज़ उठाने का वक्‍़त है जो आतंक को अंज़ाम देते हैं। 
आतंकफैलाने का मक़सद है हमें बाँटना, हमारे जोशो-खरोश को ठंडा करना, तर्कणा को नष्‍ट करना,सामाजिक ताने-बाने को छिन्‍न-भिन्‍न करना और हमारी समृद्ध विविधता जो हमेंसबसे प्राचीन सभ्‍यता और आवेगमय लोकतंत्र बनाती है, उसको तहस-न‍हस करना। यदि हमनफ़रत, धर्मान्‍धता और असहिष्‍णुता के सामने घुटने टेक देंगे या यदि हम अपनीनागरिक आज़ादी पर अंकुश लगायेंगे, अपनी किन्‍हीं भी संवैधानिक स्‍वतंत्रताओं औरअधिका‍रों को निलंबित करेंगे या किसी संप्रदाय विशेष को विलेन बनाकर उनपर निशानासाधेंगे तो आतंकवादी अपने मक़सद में क़ामयाब हो जायेंगे।  
किसीभी प्रकार का ऑनलाइन उन्‍माद, टीवी उपदेश, इस्‍तीफ़े की माँग या कोई भी बेमतलब कीहरकत कोई वास्‍तविक बदलाव नहीं ला सकती यदि हम नफ़रत को पलने और फलने फूलने कामौका देते रहेंगे। जब तक नफ़रत मौजूद है, जब तक हम नफ़रत फैलाने वालों को बर्दाश्‍तकरते रहेंगे, जब तक हम असहिष्‍णुता की राजनीति का बहिष्‍कार नहीं करते, तब तक शायदशान्ति के बारे में सोचना बेमानी है। नफ़रत की राजनीति केवल और भी ज्‍़यादा नफ़रतही पैदा कर सकती है;कोईबावला ही ऐसा विश्‍वास कर सकता है कि नफ़रत का गहराता चक्र शान्ति और समृद्धता कीओर ले जायेगा और एक शक्तिशली लोकतंत्र एवं सौहार्दपूर्ण समाज को मज़बूत बनायेगा।कृ्पया नफ़रत को न बढ़ावा दें।      
आइयेहम नफ़रत फैलाने वालों की निन्‍दा करें चाहे वो किसी भी संप्रदाय, जाति अथवा पंथके हों। आइये हम यह माँग करें कि सभी धमाकों और हमलों के दोषियों को सजा मिले।लेकिन सबसे पहले आइये हम आत्‍मचिंतन करें, अपने अंदर झाँक कर देंखें और अपनेपूर्वाग्रहों, असहिष्‍णुता और पक्षपातों को दूर करें। जब हम एक व्‍यक्ति, एक कौम,समाज और राष्‍ट्र के रूप में नफ़रत से छुटकारा पा लेंगे तभी हम शान्ति की कल्‍पनाकर सकते हैं। नफ़रत के इस दुष्‍चक्र से निपटने की दिशा में यह पहला कदम होगा। आइयेहम उनसे सीखें जो भुक्‍तभोगी हैं लेकिन फिर भी नफ़रत नहीं पालते और उन सभी कोखारिज़ करते हैं जो उनके नाम पर नफ़रत को फैलाते हैं और उसको बढ़ावा देते हैं!यही सच्‍ची श्रद्धांजलि होगी।
(मेरेअनुसार यही मुम्‍बई की सच्‍ची ‘रिज़ीलिएण्‍ट स्पिरिट’ और भारत की आत्‍मा का सारतत्‍वहै) 
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 डॉ. सुब्रमणियम स्‍वामी और डीएनए के संपादक के नाम ईमेल भेज कर स्‍वामी के लेख की निंदा करें और नीचे दिए गए लिंक्स पर अपनी प्रतिक्रिया दर्ज करें:
सुब्रमणियम स्‍वामी : swamy39@gmail.com
अजय सिन्‍हा, संपादक, डीएनए : asinha@dnaindia.net
http://blogs.wsj.com/indiarealtime/2011/07/27/swamy-op-ed-stokes-furor-at-harvard/
 http://www.thecrimson.com/article/2011/7/27/swamy-harvard-india-petition/

Why is the law on Communal Violence specifically addressing protection of religious minorities?

PRESS RELEASE

Why are secular and civil liberty activists disappointed with the NAC Draft Bill Draft ‘Prevention of Communal and Targeted Violence (Access to Justice and Reparations) Bill, 2011
The need for a new legislative mechanism, to deal with communal violence targeting religious minorities, was confirmed by the experience of the 1983 Nellie killings in Assam, anti Sikh massacre of 1984, the genocidal pogrom against Muslims in Gujarat in 2002 among others. The abdication of all preventive measures, absence of protection for the lives and properties of the religious minorities and the absolute impunity thereafter for these crimes characterised each violent assault. State records, such as Commission of Inquiry reports, of the 1961 Jabalpur riots, the Madon Commission report of Bhiwandi riots in 1970, the report into the Bhagalpore riots of 1989 and the Srikrishna Commission report on Bombay riots of 1992-1993, all documented that, prior to, during and post the violent attacks on religious minorities, state complicity and institutional bias was evident among different public authorities and state officials. Time after time the protection of minorities was highlighted as an issue of concern and this placed centre stage the need for legal and other measures to be taken to ensure protection of religious minorities. Some of the issues that emerged from the narratives of these experiences reveal acts of omission and commission by officers of the state and others, who wield the power of the state. It was found time and again that violence could have been controlled or stopped if there had been willingness to act on behalf of the state. The problem of state complicity and impunity are recurring themes in all these episodes.
People impacted by communal violence do span all communities. However studies and data clearly indicate that religious minorities suffer greater harm and loss, and find less protection from the law, due to institutional bias in the performance of statutory duties. This has been a serious lacuna that has for some decades required to be addressed.
The constitutional promise of equality before the law, as embodied in Article 14, requires us to make rational discrimination in our treatment of problems that come before us. The mounting evidence in the decades past, show that the legal protection secured for religious minorities has declined, gravely infringing their enjoyment of the right to life and other fundamental rights, as citizens. This calls for a corrective measure in the exercise of state power and actions of state agencies, to restore equality in the working of the law. This explains why a special legislation for religious minorities is being proposed. The outcry by the BJP against a law for protecting the rights of religious minorities is neither legally nor factually tenable. In so far as Scheduled Castes and Scheduled Tribes are concerned the State under Article 15(4) Constitution can make laws for their protection.
Campaign for a CV law initiated by civil society activists
The campaign, for a law to protect religious minorities and punish the sponsors, abettors and perpetrators of communal and targeted violence, was initiated by civil society groups and activists. (This legislation is commonly referred to as the CV Bill). The CV Bill placed before Parliament by the UPA Government in 2005, was rejected outright by civil society. Through 2 National Consultations, the key elements and a draft outline of the law was prepared, drawing upon experience, insights and discussions with victim survivors, activists and legal and other experts. There was unanimity that a new law was required to respect and protect the rights of religious minorities Scheduled Castes and Scheduled Tribes, cognizant of the contours of communal and targeted violence. The primary focus of such a law, it was agreed, would be making those exercising state authority and power accountable to the law; through the setting out of offences by public officials and those with the power to protect persons and communities affected by communal and targeted violence; hold the superior functionaries culpable; dilute the shield of impunity. Enabling provisions to allow the victim/ witness to access the criminal justice system would be incorporated, mindful that fair trial standards and rights of the accused are respected. The new law would also introduce the rights of all affected persons to reparation from the State. From the analysis of communal and targeted violence, it was clear to the activists that the new legislation should not in any way enhance the arsenal of State power. A draft outline of the CV Bill was submitted by civil society activists to the Hon’ble Law Minister, in May 2010.

In July 2010 the NAC Working Group on the Communal Violence Bill set up an Advisory Group and Drafting Committee, to prepare a draft legislation on the subject. The Draft ‘Prevention of Communal and Targeted Violence (Access to Justice and Reparations) Bill, 2011, prepared by NAC and on which comments are invited, has some disturbing features which we believe are contrary to the purpose and objectives of such a law. It is a cause of serious concern for all of us that a Bill which contains regressive and draconian principles, has been adopted by the NAC and proposed as its draft CV Bill.
The pernicious idea of “disturbed area” was proposed in the Government CV Bill of 2005. Well aware that the accumulation of extraordinary powers in the hands of state authorities leads to gross violations of human rights, as witnessed in Punjab, Nagaland, Manipur and Kashmir, civil society contested any use of the mechanism of disturbed area on the pretext of providing protection to victims. The Key Elements of the CV Bill as enumerated on the NAC website also state that the “Basic framework of law must not rest on declaration of “disturbed areas””. This has been the consistent position through the discussions on the making of the law. The NAC draft Bill however in Clause 20 reintroduces the idea of “internal disturbance” and states that organized communal and targeted violence shall constitute “internal disturbance” within the meaning of Article 355 of the Constitution, and empowers the Centre to take such measures as required. During the drafting process it was suggested to the NAC that reliance for Entry point of the law should be on the latter part of Article 355, “to ensure that the government of every state is carried on in accordance with the provisions of this Constitution”. It is therefore extremely puzzling and worrisome as to what prompted the insertion of the clause relating to “internal disturbance”. The inclusion of any form of “ disturbed areas” device to concentrate power in the hands of certain government functionaries is not acceptable. Clause 20 also attempts to reconfigure the federal equation between the Centre and State, a move that is ill advised and counterproductive. It would indeed be short sighted of civil society to support any provisions that further legitimise use of draconian measures by the state against the citizenry.
Central to the drafting of a new CV Bill is a definition that describes what constitutes ‘’communal and targeted violence”. Civil society groups had through public consultations arrived at a working definition in May 2010, and forwarded the same to the Law Minister. The NAC Draft CV Bill, proposes in Clause 3© “communal and targeted violence means and includes any act or series of acts, whether spontaneous or planned, resulting in injury or harm to the person and or property, knowingly directed against any person by virtue of his or her membership of any group, which destroys the secular fabric of the nation.” This definition is central to the Bill, and all offences and rights of victims to justice and reparation will ensue only if the action warrants description as a communal and targeted violence. It is arguable, if any event of violence in post independent India, whether against religious minorities or Scheduled Castes or Scheduled Tribes, can be said have destroyed the secular fabric of India. The aim of the civil society campaign for a CV Bill is to provide statutory protection against all and each act of communal and targeted violence. The NAC draft Bill has raised the threshold so high that no act of communal and targeted violence against Dalits, Scheduled Tribes or religious minorities would come within the ambit of the CV Bill. This preliminary definition, by shifting its focus away from affected people, whose security, equality and citizenship are jeopardized by communal and targeted violence or organized communal and targeted violence, has ousted the most vulnerable from its statutory protection, rendering this Bill toothless and meaningless.
One main thrust of this legislation is to counter impunity by securing accountability from all persons exercising State power, for acts of omission and commission, relating to communal and targeted violence. This requires the acknowledgment of certain offences in the CV Bill. At the same time since this Bill deals with offences it is important to define them sharply and clearly. The NAC Bill falters on both these counts. It fails to incorporate crimes such as disappearances, although India is already a signatory to the Convention Against Enforced and Involuntary Disappearances and has in its recent pledge before the Human Rights Council at the UN, stated that it would work towards ratification of the Convention. The definition of Torture in Clause 12 of the NAC draft Bill falls short of the definition proposed by the Rajya Sabha Select Committee on the Prevention of Torture Bill. Definition of command or superior responsibility in Clauses 14-15 as well as offences by public servants in Clause 13, which extend criminal liability to those who mastermind, sponsor and allow communal and targeted violence, lack legal certainty and precision. Inclusion of phrases such as ‘impartial’, ‘fairness’, ‘respectful’ or ‘dignity’, do not secure any rights for the victims nor do they place any legal obligation on duty bearers. For impunity to be reined in, particularly at the top echelons of political and administrative authority, much more purposeful drafting is required.
The NAC draft Bill makes a half-hearted attempt to address the difficult circumstances in which victims of communal and targeted violence find themselves in the aftermath of an attack. Clause 61 of this Bill, recognizes the need to assist displaced victims to initiate legal proceedings. However it is baffling why the police officer visiting the relief camp, “will record statements and conduct an inquiry into the circumstances and cause of each individual being displaced and put in a relief camp”. Would the cause of justice not be better served if the police officer records statements of victims with respect to commission of cognizable offences, dispatch such statements to be registered as FIR and investigated by the Police Station of competent jurisdiction. Similarly Clause 64 (1) is misconceived, as it makes it compulsory for the statement of victim- informant to be recorded by a Magistrate on oath. This does not recognize the situation in which victims find themselves after a communal and targeted assault and will only heighten their vulnerability, particularly in light of the scant protection offered to witnesses by this Bill. Clause 64 (4), which permits a victim or witness to submit any statement or material directly to the Designated Court and the same shall form part of the charge sheet is contrary to all norms of fair trial standards and deserves deletion.
For victims and witnesses of communal and targeted violence to access justice, a few enabling provisions are required. The NAC Bill fails to draw upon the advances made in the jurisprudence and practices of victim and witness protection and restricts victim protection only to ‘the period of investigation and trial’ (refer to Clauses 86-87). The NAC draft Bill places no obligation on the State to protect witnesses after they depose against the socially and politically powerful. This Bill claims to offer protection during trial by keeping the identity of the witnesses confidential. However Clause 88 of the NAC draft Bill makes it mandatory for all court proceedings under this law to be video recorded and a copy of this recording to be given to the accused person among others. While apparently enhancing transparency, there is a serious apprehension that in the short term and long run, these video recorded proceedings may increase the vulnerability of the victim/witnesses.
Further to withstand legal scrutiny, the deviation from, the Criminal Procedure Code and the law of evidence in this legislation, must be minimal. It is extremely unfortunate that the NAC draft Bill draws upon provisions found in draconian laws such as MCOCA and earlier in TADA and POTA, to modify criminal procedure. Illustrative of this is Clause 82, which authorises attachment of property of the accused at the stage of charge, without the usual guidance that such property should be linked to the offence. Again Clause 85, increases the period of detention of the accused and places a heavier burden on the accused for securing bail. Similarly Clause 67, of this Bill gives the state and central government the power to intercept telephonic communication, and censor and control the same. The draft Bill states that “any message or class of messages to or from any person or class of persons or relating to any particular subject, brought for transmission by or transmitted or received by any telegraph, shall not be transmitted, or shall be intercepted or detained, or shall be disclosed to the government …” This could well be used to stop messages going out to, or from, victim groups. Why would we want to risk legalising this kind of power? It is regrettable that no lessons seem to have been learnt, that the whittling down of civil liberties in one sphere provides the state with an alibi to erode rights across the board. The very ‘group’ that this Bill seeks to protect could well become the target of such excessive measures.
Clause 78 of this Bill is based on a flawed understanding of the criminal justice system. The Special Public Prosecutor (SPP) in a criminal trial represents the state and not the victim/ informant or witness. The role of the SPP is to advance the interests of justice in a criminal trial and not the interests of a victim or witness. Accordingly the appointment or dismissal of a SPP cannot be decided through “general public comments” or to serve the interests of any party before the Court. Fair trial standards demand that the SPP discharges his duty without bias against any party.
With 178 human rights institutions already in existence, clearly any proposal to establish newer bodies must be approached with maturity and sobriety. The limited purpose why a National Authority is needed is only to ensure that the changes brought in through this CV law, particularly in relation to offences committed by public servants, superiors and commanders are operationalised. That is the specific purpose and it is to ensure this that that the latter part of Art. 355 is operationalised. This is an important function of the Union government at the Centre, not to be intrusive, not to be usurping of the power of the state, but to ensure that the laws are implemented and the State performs its functions in accordance with the constitution. If there is a state authority, as envisaged in the NAC draft Bill, the drafts persons may need to explain how an authority located within the state will keep itself aloof from the immediacy of the violations and not be open to use and abuse.
The most promising aspect of the relief and rehabilitation chapter of the NAC draft Bill, is that it recognizes that while the religious minority suffer a particular disadvantage in terms of impunity and complicity of the state, all victims of communal and targeted violence need to be recognized in law for purposes of compensation, relief, rehabilitation etc. That has been acknowledged in the law and this is an important acknowledgment. However due to tardy drafting, rights for all affected persons regardless of denomination, is not reflected in Clause 90.
The way relief and rehabilitation has been conceptualized in this Bill however is quite problematic, it is paternalistic and does not invest rights in the affected persons. The term reparation under international law encompasses within it aspects of rescue, relief, compensation, rehabilitation, public apology and guarantee of non-repetition. The term ‘reparation’ in the NAC draft Bill has been used alongside relief, compensation etc. which is confusing and misleading. A clear articulation of the right to reparation and what it encompasses is required in the law.
The idea that loss of earning capacity should be a criterion for determination of compensation for victims of communal and targeted violence is contrary to any notion of reparative justice. The draft Bill does not recognise that victims of targeted and communal violence are not akin to victims of natural disaster, or victims of industrial disaster, or victims of workplace accidents (Schedule IV). Introducing loss of income as the basis for determining compensation misses the distinctiveness of victims of targeted and communal violence, which often includes dislocation, exclusion, difficulties of return, the failure of responsibility of the state to protect. The present Schedule is a partial compilation of existing provisions, but it is difficult to see how these may be relevant in the context. More thinking needs to go into what would constitute compensation where communal and targeted violence occurs. The Bill sees State assessment committee and District Assessment committees as agencies that will identify victims, make lists, issue identity cards and certificates. There is an objectification of the victim that apart from other things is not in consonance with the way international law has developed to help us see the place occupied by victims. There is a token mention of agencies of victims with the full participation of the victims but the same is not actualised in the way the chapter is set out. Revamping of this chapter to recognise the rights of the victims, the responsibility and obligations of state actors, liabilities of the state and consequences when these obligations are not fulfilled, is necessary.
Clause 111 of the draft Bill seems to have strayed into this Bill. It is taken from the Bhopal Claims Act 1985, which was later introduced in Schedule to the National Environment Tribunals Act 1995 (which passed into oblivion without ever being notified). The Bhopal Claims Act dealt with a situation where a corporation, as an economic centre of power, may be required to pay for all costs, injuries and losses arising from an industrial disaster. The CV Bill does not share any aspect of the situation. The idea that administrative costs and litigation costs, for example, are to be recovered does not acknowledge the complicity of the state nor how the offender will be identified who should pay for the costs set out in the Schedule. This is inapposite, and adds to the confusion on compensation and reparation.
Among the disturbing equivalences made in the draft Bill is the use of the standard in the Land Acquisition Act 1894 in computing loss due to injury to property. It is widely known that `compensation’ in the 1894 Act is as contested as the power of the state to compulsorily acquire under that Act. Reference to compulsory acquisition as setting the standard, and relying on the highly contested 1894 Act to dictate compensation for injury to property, is inexplicable.
The retention of requirement of prior sanction for prosecution of public servants and the good faith clause for actions done in pursuance of the Bill, subvert the main objective of this Bill and is a contradiction in terms. Interestingly Clause 76 of this draft Bill excludes prior sanction for offences detailed in Schedule III, which are largely offences under the Indian Penal Code pertaining to the performance of official functions by public servant. However the requirement of prior sanction has been retained for graver offences enumerated in Schedule II and more significantly for all the crimes formulated in this draft Bill. Clause 130 of this draft Bill, retains the good faith clause for all acts done by public servants of the Central government, State government, National Authority and State Authority, sowing the seeds for lack of accountability and transparency in discharge of public functions.
We, the undersigned, secular and civil liberty activists, organizations, members of the three National Consultations on the CV Bill cannot accept the present NAC Draft ‘Prevention of Communal and Targeted Violence (Access to Justice and Reparations) Bill, 2011. We will continue our struggle for a meaningful and effective CV Bill.

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हाशिमपुरा नरसंहार: कब कटेंगे अन्याय के लम्बे बरस?

महताब आलम

“जीवन के कुछ अनुभव ऐसे होतें हैं जो जिन्दगी भर आपका पीछा नहीं छोडतें.एक दु:स्वप्न की तरह वे हमेशा आपके साथ चलतें हैं और कई बार तो कर्ज की तरह आपके सर पर सवार रहतें हैं. हाशिमपुरा भी मेरे लिये कुछ ऐसा ही अनुभव है.22-23मई सन 1987की आधी रात दिल्ली गाजियाबाद सीमा पर मकनपुर गाँव से गुजरने वाली नहर की पटरी और किनारे उगे सरकण्डों के बीच टार्च की कमजोर रोशनी में खून से लथपथ धरती पर मृतकों के बीच किसी जीवित को तलाशना सब कुछ मेरे स्मृति पटल पर किसी हॉरर फिल्म की तरह अंकित है,”  ये कहना है महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय   हिंदी विश्वविद्यालय  वर्धा के कुलपति एवं गाजियाबाद के तत्कालीन एसपी विभूति नारायण राय का. उस रात, मेरठ शहर के हाशिमपूरा इलाके में उत्तर प्रदेश पीएसी के जवानों ने 42 मुस्लिमों की निर्मम हत्या कर दी थी.
कब कटेंगे अन्याय के लम्बे बरस ?
राय आगे कहते है,”उस रात द्स-साढे दस बजे हापुड़  से वापस लौटा था.साथ में जिला मजिस्ट्रेट नसीम जैदी भी थे, जिन्हें उनके बँगले पर उतारता हुआ,मैं पुलिस अधीक्षक निवास पर पहुँचा.निवास के गेट पर जैसे ही कार की हेडलाइट्स पड़ी मुझे घबराया हुआ सब इंसपेक्टर वीबी सिंह दिखायी दिया,जो उस समय लिंक रोड थाने का इंचार्ज था.मेरा अनुभव बता रहा था कि उसके इलाके में कुछ गंभीर घटा है. मैंने ड्राइवर को कार रोकने का इशारा किया और नीचे उतर गया.
वीबी सिंह इतना घबराया हुआ था कि उसके लिये सुसंगत तरीके से कुछ भी बता पाना संभव नहीं लग रहा था.हकलाते हुये और असंबद्ध टुकडों में उसने जो कुछ मुझे बताया वह स्तब्ध कर देने के लिये काफी था.मेरी समझ में आ गया कि उसके थाना क्षेत्र में कहीं नहर के किनारे पीएसी ने कुछ मुसलमानों को मार दिया है, इसके बाद की कथा एक लंबा और यातनादायक प्रतीक्षा का वृतांत है जिसमें भारतीय राज्य और अल्पसंख्यकों के रिश्ते,पुलिस का गैर पेशेवराना रवैया और घिसट घिसट कर चलने वाली उबाऊ न्यायिक प्रणाली जैसे मुद्दे जुडे हुयें हैं”.
तारीख पर तारीख
22 मई 1987 को जो मुकदमा गाजियाबाद के थाना लिंक रोड और मुरादनगर पर दर्ज कराया गया था. पहले तो कई सालों तक यूँ ही बंद रहा और उस पर कोई कार्रवाई नहीं हुई. मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के लगातार कोशिशों के बावजूद भी जब मुकदमे की कार्रवाई शुरू नहीं हुयी तो उच्चतम न्यायालय   में केस को दुसरे राज्य में स्थानान्तरित  करने कि याचिका  दायर की गई. 2002 में, उच्चतम न्यायालय के आदेश पर मुकदमे को दिल्ली के तीस हजारी कोर्ट में स्थानान्तरित कर दिया गया. लेकिन उससे भी बात नहीं बनी क्योंकि  उत्तरप्रदेश सरकार ने केस लड़ने के लिए कोई वकील ही नहीं नियुक्त किया.नरसंहार के बीस
वर्षो बाद जब 24 मई 2007 को सूचना के अधिकार के तहत ये पता किया गया कि उस घटना के आरोपियों के साथ क्या हुआ तो डीजीपी कार्यालय ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि सब के सब आरोपी अभी भी नौकरी में बने हैं और यही उनकी सर्विस डायरी में ऐसी किसी घटना का उल्लेख तक नहीं है. पिछले 24 वर्षों से विभिन्न बाधाओं से टकराते हुये अभी भी मामले अदालत में चल रहें हैं और अपनी तार्किक परिणति की प्रतीक्षा कर रहें हैं.
कब मिलेगा न्याय ?
वो तार्किक परिणति कब आएगी, को जानने के लिए मैंने इस मामले के वकील अकबर अबिदी को फोन किया तो उनका जवाब था. “अगली तारीख, 30 मई को है.” दिल्ली के तीस हजारी कोर्ट में इस मामले को देख रहे अकबर अबिदी ने बताया कि मुक़दमा अभी किसी परिणति पर पहुँचने के लिए बाकी  है. ज्यादातर  गवाहियाँ हो चुकी है. इस मामले में लगभग 140 गवाह थे, जिसमे पिछले 24 वर्षो में 20 की मौत हो चुकी. इसी दौरान 19 आरोपियों में से 3 आरोपी भी मर चुके हैं. अबिदी ने आगे कहा कि अगले कुछ महीनों  मुकदमे का फैसला सुना दिया जायेगा.

हाशिमपुरा कि घटना, भारतीय इतिहास में कोई मामूली घटना नहीं थी. एक रात में, एक ही जगह के, एक ही समुदाय के 42 लोगों को मौत के घाट उतर दिया गया था. और ये सब किसी किसी आम व्यक्तियों के गिरोह ने नहीं किया था बल्कि उन लोगों ने किया था जिन पर जनता के रक्षा की जिम्मेवारी है. इस घटना ने पूरे भारत के नागरिकों, खासतौर पर मुसलमानों का दिल दहला दिया था, लेकिन विडम्बना ये है कि आज इस घटना के 24 साल गुज़र चुके हैं. गवाहियों पर गवाहियों हो चुकी है.कितने लोग न्याय का आस लिए इस दुनिया से गुज़र चुके हैं.गवाहों के बाल  सफ़ेद हो चुके हैं. देश की जनता भूल चुकी है और हाशिमपुरा के लोग भी,खास तौर पर नई पीढ़ी भूलने जा रही है.लेकिन नतीजा वही, तारीख पर तारीख. क्या हमारे देश में न्याय का यही भविष्य है ?
महताब आलम

(महताब आलम मानवाधिकार कार्यकर्ता एवं स्वतंत्र  पत्रकार हैं. उनसे activist.journalist@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है.)