भँवर मेघवंशी
आजादी की कथित दूसरी लड़ाई के मीडिया जनित महानायक अन्ना हजारे के आंदोलन की रूपरेखा बनाने से लेकर उसके सफल प्रबंधन एवं उसमें सक्रिय भागीदारी करने में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की भूमिका की पुष्टि हो चुकी है, इसलिए भ्रष्टाचार विरोधी इस गांधीवादी आंदोलन के साम्प्रदायिक चरित्र पर चर्चा करना जरूरी हो गया है। कोई भी आंदोलन संख्या बल में कितना ही विशाल क्यों न हो, उसके पीछे कौन सी ताकतें काम कर रही है तथा उनका मकसद क्या है, यह जाने बगैर उस आंदोलन का विश्लेषण अधूरा रह जाता हैं। कई दृष्टिकोणों और पहलुओं से अन्ना के अनशन व आंदोलन पर चर्चा की गई है, जैसे कि क्या यह गांधीवादी आंदोलन था? क्या यह पूर्णतः राजनीति निरपेक्ष आंदोलन था? क्या यह समाजवादी एवं लोकतांत्रिक आंदोलन था? क्या यह मीडिया द्वारा प्रायोजित था? क्या इसे कारपोरेट जगत ने वित्त पोषण दिया? क्या यह मात्र एक एनजीओ उपक्रम था? क्या यह पूरे भारत का आंदोलन था? इन सब बातों पर विस्तार से अलग-अलग लोगों ने अपने विचार व्यक्त किए है, मुझे लगता है कि इस बात की चर्चा कम हुई है कि क्या यह आंदोलन धर्म निरपेक्षता के संवैधानिक मूल्यों पर टिका था अथवा किसी खास विचारधारा की ओर झुका हुआ था? विशेषतः संघ विचार परिवार की ओर ?
अन्ना आंदोलन के रणनीतिकार इस बात को सिरे से नकारते है कि उनका हिन्दुत्ववादी ताकतों से कोई सीधा संबंध है, लोगों ने उनकी बातों का भरोसा भी किया, लेकिन जो तथ्य और परिस्थितिजन्य साक्ष्य है, वे चीख चीख कर यह बता रहे है कि यह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सहयोग व समर्थन पर ही टिका हुआ आंदोलन था, टीम अन्ना के सदस्य अरविन्द केजरीवाल, किरण बेदी, प्रशांत भूषण आदि इत्यादि इस सत्य को स्वीकारे अथवा नहीं स्वीकारे, स्वयं आरएसएस आधिकारिक रूप से इस सत्य को स्वीकार चुका है कि उनके समर्थन के बिना यह आंदोलन न तो खड़ा होता और न ही इतना चल पाता, क्योंकि इंडिया अंगेस्ट करप्शन के पास कोई कैडर तो है नहीं, केवल मंचीय नेता है, भला टीवी देखने मात्र से जनता सड़कों पर उतरती है? उन्हें तो योजनाबद्ध तरीके से घरों से निकालना पड़ता है, यह काम टीम अन्ना और एनजीओ ने नहीं, बल्कि संघ विचार परिवार से जुड़े आनुषांगिक संगठनों ने किया है।
अब यह भी साबित हो चुका है कि न केवल आरएसएस ने अन्ना आंदोलन के लिए भीड़ जुटाई बल्कि इस आंदोलन का रोड़ मेप भी उसी ने तैयार किया। भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन की रणनीति मार्च 2011 में कर्नाटक के पुत्तर में हुई राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा की बैठक में ही तय हो गई थी, इसी के बाद अन्ना ने अप्रेल तथा बाद में अगस्त में भ्रष्टाचार के खिलाफ अनशन किया। हाल ही में उजागर हुआ कि अन्ना टीम के सबसे चमचमाते युवा चेहरे अरविन्द केजरीवाल जो कि एक मारवाड़ी खानदान से ताल्लुक रखते है। उनके पिता व चाचा दोनों ही हरियाणा में आरएसएस तथा उससे जुड़े संगठनों के पदाधिकारी रह चुके है। अरविन्द केजरीवाल ने अपने सार्वजनिक जीवन में कभी भी इन दक्षिणपंथी समूहों की खुलकर आलोचना नहीं की, उनका रवैया सदैव ही संघ परिवार के साथ नरमी का रहा है। भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी के साथ उनकी नजदीकी कोई छिपी हुई बात नहीं है। इस पूरे आंदोलन के दौरान जिस प्रकार वे अरूण जेटली, सुषमा स्वराज तथा नितिन गडकरी के साथ संपर्क बनाये हुये थे, उससे भी यह शक गहरा जाता है कि अंदर ही अंदर आरएसएस और अन्ना टीम के प्रमुख सदस्य अरविन्द केजरीवाल के साथ कुछ पक रहा था? यह अनशन के आखिरी दिन खुलकर पता भी लग गया जब संसद में हो रही बहस पर नाराजगी प्रकट करते हुए अरविन्द चैनलों पर बोले कि धारा 184 के तहत सरकार वोटिंग क्यों नहीं करा रही है? एक दिन पहले ही भाजपा ने इसी मुद्दे पर हंगामा किया तथा संसद में बहस नहीं होने दी, वह भी धारा 184 के तहत बहस पर अड़ी हुई थी ताकि वोटिंग कराई जा सके? भाजपा सफल नहीं हुई तो अरविन्द को खुलकर सामने आना पड़ा तथा उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि हम संसद में वोटिंग चाहते है? तो क्या अरविन्द, आरएसएस और भाजपा चाहते थे कि सप्रंग सरकार गिराई जाये। क्यों और किनके इशारों पर अरविन्द सरकार को गिराना चाहते थे ? इस सच्चाई को अभी सामने आना है।
खैर, बात अन्ना टीम के संघ-भाजपा रिश्तों को लेकर है तथा इन्हें नकारने का कोई कारण इस टीम के पास नहीं बचता है। अन्ना सदैव ही संघ परिवार के अतिप्रिय व्यक्ति रहे है, यह जानना रोचक होगा कि अन्ना द्वारा रालेगण सिद्धी में किए गये ‘‘आदर्श गांव’’ के प्रयोगों को ‘‘राम राज्य’’ लाने वाला बताते हुये संघ के तत्कालीन सहसरकार्यवाह हो. वे. शेषाद्रि ने एक किताब लिखी थी। अन्ना हजारे के आदर्श कार्यो पर यह संभवतः पहली किताब थी। संघ के एक प्रचारक बी.एम. दाते ने पुणे तथा उसके इर्द गिर्द अन्ना के पक्ष में कई कार्यक्रम आयोजित किये थे, संघ के एक थिंकटैंक के.एन. गोविन्दाचार्य मानते है कि आरएसएस के कई स्वयंसेवकों ने अन्ना के गांव रालेगण सिद्धी की यात्रा की है। अन्ना भी कभी संघ विचार परिवार के खिलाफ नहीं रहे। संघ के साथ उनके रिश्ते 1995 तक बेहद करीबियत के रहे, जब अन्ना ने महाराष्ट्र की भाजपा शिवसेना युति सरकार के दो मंत्रियों – भाजपा के महादेव शिवणकर तथा शिवसेना के शशिकांत सुतार को भ्रष्टाचार के लिये निशाना बनाया तो आरएसएस के साथ उनके संबंध असहज हो गये, लेकिन फिर भी आरएसएस ने सदैव अन्ना के मंदिर मंे रहकर जीवन यापन करने, ग्रामस्वराज के जरिये पुरातन भारतीय संस्कृति को पुर्नजीवित करने के रालेगण सिद्धी के प्रयोगों की भरपूर सराहना की, संघ के मुखपत्र पांचजन्य ने उन्हें भारतीय नायको ंके रूप में निरूपित किया तथा वे इसके विशेषांकों के कवर पर भी छपते रहे।

इस बार जब भ्रष्टाचार के मुद्दे पर संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार को घेरने में भाजपा नाकाम रही तो उन्हें अपने प्रिय नायक अन्ना हजारे की याद आई तथा उन्होंने अन्ना के जरिये भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन खड़ा करने की रणनीति बनाई, संघ ने देश के युवाओं को इसमें जोड़ने के लिये अपने आनुषांगिक संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से जुडे़ युवाओं का ‘‘यूथ एगेन्स्ट करप्शन’’ नामक संगठन बनाया। इसी प्रकार परिवर्तन नामक संस्था चला रहे आयकर विभाग के उपायुक्त रहे मैग्सेसे अवार्ड विजेता सामाजिक कार्यकर्ता अरविन्द केजरीवाल ने नरम हिन्दुत्व के ध्वजवाहक स्वामी बाबा रामदेव, श्रीश्री रविशंकर व अन्य धर्म गुरूओं के साथ मिलकर ‘‘इंडिया एगेन्स्ट करप्शन’’ नामक संगठन खड़ा किया, दोनों समनामी संगठनों का निर्माण आरएसएस की योजना के अनुसार भ्रष्टाचार के विरूद्ध देश में एक आंदोलन छेड़ने के लिए किया गया।
इस हेतु आरएसएस ने देश भर में फैली अपनी शाखाओं के महाजाल तथा करोड़ों स्वयंसेवकों को इससे जुड़ने हेतु निर्देशित किया। हमें मानना होगा कि अन्ना के जंतर-मंतर वाले अनशन के मंच की पृष्ठभूमि संघ परिवार के कार्यक्रमों की पृष्ठभूमि से कतई भिन्न नहीं थी, वही अखण्ड भारत के नक्शे में भारत मां की छवि! फर्क इतना सा कि भगवाध्वज के बजाए हाथ में इस बार तिरंगा झण्डा था। फिर संघ के प्रमुख (सरसंघचालक) मोहन भागवत का देश के युवाओं से भ्रष्टाचार के खिलाफ जन आंदोलन से जुड़ने का आव्हान् तथा जंतर मंतर के अन्ना मंच पर राम माधव की उपस्थिति यहीं संकेत देता है कि सब कुछ संघ की मर्जी और योजना के आधार पर ही चल रहा था। जब कुछ लोगों ने संघ परिवार की भूमिका पर सवाल खड़े किये तो अगली बार थोड़ी सर्तकर्ता बरती गई। इस बार रामलीला मैदान के मंच पर राम माधव या उमाभारती नहीं आये, इस बार बागडोर संघ के स्वयंसेवक तथा वीर रस के कवि कुमार विश्वास ने संभाल ली तथा पूरे तेरह दिनों तक मंच का संचालन उन्होंने ही किया, क्या इसे संघ परिवार की योजना की सफलता नहीं कहा जायेगा।
क्या अन्ना टीम इस बात से इंकार कर सकती है कि इन्हीं कुमार विश्वास को संघ ने इसी रामलीला मैदान में बाबा रामदेव के आंदोलन के दौरान मंच संचालन हेतु भेजा था। इतना ही नहीं विश्व हिन्दु परिषद के अंतर्राष्ट्रीय अध्यक्ष अशोक सिंघल ने तो अन्ना के आंदोलन को सफल बनाने के लिये संघ के स्वयंसेवकों का शुक्रिया अदा करते हुये कहा कि स्वयंसेवकों ने वाकई सराहनीय कार्य किया है। उन्होंने कहा कि-‘‘विश्व हिन्दु परिषद की शाखा ‘धर्मयात्रा महासंघ’ के सदस्यों ने रामलीला मैदान में खाने के स्‍टॉल खोले थे, जहां हर दिन 20 हजार लोगों को भोजन कराया जाता था।’’
रामलीला मैदान से लेकर देशभर में किये जा रहे विरोध प्रदर्शनों में संघ के लोग आरएसएस की योजना के अनुसार बड़ी संख्या में शामिल हुये। भाजयुमो दिल्ली के युवा नेता तेजीन्दरपाल ने कांगे्रसी सांसदों के आवासों के घेराव की बागडोर संभाली, वहीं भाजपा सांसद अनन्त कुमार, गोपीनाथ मुण्डे तथा वरूण गांधी रामलीला मैदान में प्रत्यक्ष रूप से भी पहुंचे।
विहिप के प्रवक्ता प्रकाश शर्मा इसमें कुछ भी गलत नहीं मानते है, उनका कहना है कि संघ परिवार एक राष्ट्रवादी संगठन है, इसलिए हमनें अन्ना जैसे देशभक्त व्यक्ति के आंदोलन का समर्थन किया है, हालांकि टीम अन्ना के सदस्य प्रशांत भूषण ने भी कहा कि-‘‘इंडिया अगेन्स्ट करप्शन’’ का आरएसएस से कोई सीधा संबंध नहीं है और न ही कोई आर्थिक सहयोग लिया गया, मगर देशभर में तथा रामलीला मैदान में जुटे लाखों लोगों में उनके स्वयंसेवक भी शामिल रहे हो सकते है। विशेषतः भोजन वितरण के काम में, इसमें कुछ भी गलत नहीं है। मतलब यह है कि थोड़ी ना नुकर के बाद टीम अन्ना ने मान ही लिया कि किसी न किसी प्रकार से संघ परिवार का समर्थन इस आंदोलन को मिला है और यह सच भी है। अन्ना के अनशन के एक दिन पूर्व 15 अगस्त को आरएसएस के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख एम.जी.वैध ने बयान दिया कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अन्ना हजारे के आंदोलन को अपना संपूर्ण समर्थन व्यक्त करता है। इसी प्रकार 20 अगस्त को मध्यप्रदेश के उज्जैन में आयोजित संघ के
अभ्यास वर्ग में स्वयंसेवकों को साफ-साफ निर्देश दिए गए कि अन्ना या उनकी टीम चाहे हमसे दूरी बनाए रखे मगर हमें भ्रष्टाचार के इस मुद्दे का पूरा लाभ लेना चाहिए तथा इसमें पूरी भूमिका निभानी चाहिए। इतिहास साक्षी है कि रामलीला ग्राउण्ड में संघ के स्वयंसेवक अपनी शाखाओं में लगने वाले ‘‘भारत माता की जय’’ तथा ‘‘वंदे मातरम्’’ के नारे उसी लहजे और जुनून के साथ लगाते हुए देखे गए। यह संघ परिवार की परोक्ष उपस्थिति को साबित करने का जीवंत उदाहरण है।
यह तो रही रामलीला मैदान की बात मगर देश के बाकी हिस्सों में क्या हो रहा था उसकी बानगी समाजवादी जन परिषद के साथी गोपाल राठी द्वारा टीम अन्ना के सदस्य प्रशांत भूषण को लिखे पत्र से मिलती है कि-‘‘हमारे नगर पिपरिया, जिला-हौसंगाबाद (मध्यप्रदेश) में अन्ना हजारे की गिरफ्तारी के विरोध में भाजपा कार्यकर्ताओं ने अन्ना टोपी पहनकर मोटर साइकिल रैली निकाली व आमसभा की। विहिप ने अपने स्थापना दिवस जन्माष्टमी पर अन्ना हजारे के समर्थन में सुन्दरकाण्ड का पाठ किया। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, बजरंग दल, दुर्गा वाहिनी तथा भारतीय किसान संघ ने भी अन्ना के समर्थन में कई कार्यक्रम आयोजित किये।
कमोबेश, यहंी हालत पूरे देश की थी, हर गांव, कस्बे, नगर, शहर व महानगरों में खड़ा किया गया जन ज्वार आरएसएस तथा उससे जुड़े कार्यकर्ताओं की फौज का ही था। पूरा आयोजन संघ का था, जैसा कि उज्जैन के अभ्यास वर्ग की बैठक के बाद सरकार्यवाह श्री भैयाजी जोशी ने स्वीकारा कि अन्ना के आंदोलन में संघ के स्वयंसेवक पूरी तरह से सक्रिय भागीदार रहे है।
सवाल यह नहीं है कि आरएसएस क्यों अन्ना के आंदोलन में भागीदार रहा? यह उसका अपना निर्णय था, सवाल यह है कि गांधीवाद और सेकुलरिज्म का झण्डा थामे लोग कैसे आरएसएस की योजना का हिस्सा बन गये ?
यह अत्यन्त गंभीर प्रश्न है कि मेधा पाटकर, स्वामी अग्निवेश, प्रशांत भूषण तथा संदीप पाण्डे और इन्हीं के जैसे सैकड़ों लोग जिन्होंने सदैव साम्प्रदायिकता का विरोध किया और साम्प्रदायिक शक्तियों के निशाने पर रहे, वे किस प्रकार संघ की इस साजिश के शिकार होकर उनके खेमे में जा पहुंचे? उनके इस प्रकार ‘संघम् शरणम् गच्छामि’ से देश के करोड़ों दलित, आदिवासी और अल्पसंख्यक लोगों को निराशा ही हाथ लगी है।

क्या वे जन लोकपाल के प्रावधानों और उसके आंदोलन के पीछे की शक्तियों द्वारा खड़े किये जा रहे अराजकता के व्याकरण को समझने में विफल हुये या उन्होंने लोकप्रियतावाद के समक्ष घुटने टेक दिये या उनकी अब तक दिखाई गई धर्मनिरपेक्षता छद्म थी, इन सवालों के जवाब उन्हें देने है।
फिलहाल बस इतना ही कि देश के दलित, पिछडे़ वर्ग से आये बुद्धिजीवियों, कार्यकर्ताओं और राजनेताओं ने अन्ना आंदोलन के साम्प्रदायिक चरित्र को न केवल समय रहते पहचाना बल्कि उसका खुलासा भी करना शुरू कर दिया है। जैसा कि सुप्रसिद्ध लेखक मुद्राराक्षस ने कहा है कि ‘‘जन लोकपाल भारतीय सर्वण मध्यवर्ग का एजेण्डा है जो अति आधुनिक रूप में भी संघ की साम्प्रदायिकता को अपने में समेटे है।’’ दलित टुडे के संपादक एस.के. पंजम का मानना है कि जन लोकपाल सवर्ण हिन्दु पुनरूत्थानवाद का नया पैंतरा है। अर्जक संघ के सदस्य राजवीर यादव के मुताबिक यह भारतीय संविधान तथा संसद पर सवर्ण हिन्दु प्रभूत्ववाद का हमला है। और भी ऐसी कई बातें देशभर से आ रही है। अन्ना के आंदोलन व जन लोकपाल की असहमति ने जगह-जगह पर लोगों ने सड़कों पर उतरकर अपनी बातें कही है मगर मीडिया में उन्हें स्थान नहीं मिला है। अब मीडिया के एक हिस्से के सवर्णवादी साम्प्रदायिक चरित्र पर भी अंगुलिया उठ रही है। वंचित वर्ग में अन्ना के आंदोलन का एक बड़ा कारण प्रस्तावित जातिवार जनगणना तथा लक्षित साम्प्रदायिक हिंसा विरोधी अधिनियम को आने से रोकने की आरएसएस तथा उसके आनुषांगिक संगठनों की साजिश के रूप में भी देखा जा रहा है। अगर यह सही है तो हमकों साम्प्रदायिकता के एक खतरनाक नये उभार को देखने तथा उसके परिणाम भुगतने के लिए तैयार रहना होगा।
भँवर मेघवंशी, डायमंड इंडिया  के सम्पादक है, लेखक कई वर्षों तक आर.एस.एस से जुड़े रहे है तथा वर्तमान में दलित आदिवासी एवं घुमन्तु समुदाय के प्रश्नों पर कार्यरत हैं।
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2 responses »

  1. upendradubey कहते हैं:

    जीवंत सा सवाल है …किन्तु इस आन्दोलन ने सत्ताधीशों को जनता की ताकत का एहसास तो करा ही दिया है ….

  2. Narendra Tomar कहते हैं:

    किसी आंदोलन के वास्‍तविक चरित्र और उद्देश्‍य का निर्धारण उसके नारों से नहीं उसमें शामिल लोगों के वर्ग( और भारत मे वर्ण) से होता है।अण्‍णा टीम के सदस्‍य ही नहीं उसमें शामिल होने वाले लोगो का 90 फीसदी हिस्‍सा समाज के उच्‍च और बीच के मध्‍यवर्ग से आता और उनकी आकांक्षाओं का ही प्रतिनि‍धित्‍व करता हैं। अण्‍णा का ‘देश की दूसरी आजादी की लडाई’ का नारा दरअसल आजादी के बाद देश की 85 फीसदी आबादी की कीमत पर के फलेफूले उच्‍च और मध्‍य वर्गों का हे जो अब देश के गरीबों के उन जनवादी अधिकारों को भी छीन लेना चाहते है जिनको इन्‍होंने छह दशकों दौरान भारी संघषों से हासिल किए है।

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