(अयोध्या विवाद को लेकर उच्च अदालत के फैसले के बारे में न्यू सोशलिस्ट इनिशिएटिव, दिल्ली का वक्तव्य)
अयोध्या विवाद को लेकर उच्च न्यायालय के आए आदेश के सन्दर्भ में जनता के तमाम हिस्सों द्वारा दिखाए गए संयम और एक नया पन्ना पलटने की उनकी ख्वाहिश का जहां ‘न्यू सोशलिस्ट इनिशिएटिव’ स्वागत करती है, वहीं उसका यह भी स्पष्ट मानना है कि यह जाँचने की ज़रूरत है कि चारों तरफ दिख रही शान्ति सम्मान के साथ हासिल की गयी है या दबाव की वजह से कायम हुई है। अयोध्या मसले को लेकर हाल में संपन्न कानूनी घटनाक्रम को लेकर, क्रान्तिकारी समाजवादी राजनीति को नवजीवन प्रदान करने के लिए प्रतिबद्ध ‘न्यू सोशलिस्ट इनिशिएटिव’, बेहद चिन्तित है और उसे यह लगता है कि फैसले में यह दिख रहा है कि धर्मनिरपेक्षता, जनतंत्र जैसे अहम संवैधानिक मूल्यों के साथ समझौता किया गया है।
अयोध्या, जो लम्बे समय से हमारी साझी विरासत का एक प्रतीक रही है, जिसे 18 साल पहले साम्प्रदायिक फासीवादी ताकतों द्वारा पांच सौ साल पुरानी मस्जिद को तबाह कर कलंकित किया गया, उसकी छवि फिर एक बार मलिन हुई है। उपरोक्त जमीन के टुकड़े को लेकर, जहां पांच सौ साल पुरानी मस्जिद खड़ी थी, सामने आए अदालती फैसले का यही निचोड़ कहा जा सकता है।
इलाहाबाद उच्च अदालत की तीन सदस्यीय लखनऊ पीठ द्वारा दिए निर्णय ने उपरोक्त जमीन के मालिकाना हक विवाद को तीन पक्षों के बीच के सम्पत्ति विवाद में रूपान्तरित कर दिया और एक तरह से यह निर्णय दिया कि ऐसे मामलों को तय करने के लिए वास्तविक तथ्यों की नहीं जनता की मान्यताओं की जरूरत है। क़ानून के बजाय आस्था का यह महिमामण्डन या ठोस वैज्ञानिक सबूतों के बजाय धर्मशास्त्र की दी जा रही दुहाई को हम आजाद भारत के न्यायिक इतिहास के पतन की पराकाष्ठा कह सकते हैं। गौरतलब है कि अदालत ने जहां एक तरफ सुन्नी वक्फ बोर्ड की याचिका को खारिज कर दिया, जिसके पास जमीन का समूचा मालिकाना था, और अन्त में उसे जमीन का एक तिहाई हिस्सा दिया। ऐसा लगता है कि प्रस्तुत फैसला ठोस कानूनी सिद्धान्तों के आधार पर नहीं बल्कि दो समुदायों के बीच लम्बे समय से चल रहे विवाद के निपटारे की नीयत से प्रेरित है। यह बिल्कुल ठीक जान पड़ता है कि यह फैसला ‘पंचायती’ किस्म का निर्णय है जहां मध्यस्थ की बात को ही अन्तिम शब्द समझा जाता है। यह बात भी बेहद आश्चर्यजनक है माननीय न्यायाधीशों ने इस मुद्दे पर अपनी राय बनाने के लिए ऐसे अन्य मसलों की भी चर्चा नहीं की। बंटवारे के पहले लाहौर का शहीदगंज गुरूद्वारे का मसला चर्चित रहा है जिसमें बाद में प्रीवी कौन्सिल को हस्तक्षेप करना पड़ा था और व्यवस्था देनी पड़ी थी कि मुसलमानों के इस दावे को खारिज कर दिया गुरूद्वारा कुछ समय पहले तक मस्जिद के रूप में कार्यरत था।
इस फैसले के बाद हिन्दुत्व ब्रिगेड के खेमे में मची खुशी को समझा जा सकता है। इस फैसले ने उनकी लम्बे समय से चली आ रही मांग को साबित कर दिया है कि आस्था के मामले कानून से ऊपर होते हैं। अपनी आसन्न जीत को देखते हुए उन्होंने दोनों समुदायों के बीच मौजूद अन्य विवादास्पद मुद्दो को भी उठाना शुरू किया है , यहां तक कि उन्होंने कहा है कि मुसलमानों को चाहिए कि वे मथुरा, वाराणसी और अन्य हजारों स्थानों पर अपने दावे खुद छोड़ दें। इस तरह यह बात विचलित करनेवाली है कि इस फैसले ने हिन्दुत्व की सियासत को नयी ऊर्जा प्रदान की है, जिसे हाल के समयों में कई हारों का सामना करना पड़ा था।
नब्बे के दशक में आए सर्वोच्च न्यायालय के एक फैसले जिसमें हिन्दुत्व को जीवनप्रणाली घोषित किया गया था और जिसने हिन्दुत्व की असमावेशी परियोजना को नयी वैधता प्रदान की थी, इलाहाबाद हाईकोर्ट के लखनऊ पीठ का यह फैसला, जो एक तरह से झुण्डवादी दावों (majoritarian claims) की बात करता और इन्साफ की अनदेखी करता है, आनेवाले लम्बे समय तक नज़ीर बना रहेगा।
‘न्यू सोशलिस्ट इनिशिएटिव’ का साफ मानना है कि इस बात को मद्देनज़र रखते हुए कि स्वतंत्र भारत की आगे की यात्रा में और भारतीय संविधान की मूल आत्मा धर्मनिरपेक्षता और जनतंत्र पर इस अदालती फैसले के अहम प्रभावों को देखते हुए इस मसले को सर्वोच्च न्यायालय की बड़ी पीठ के सामने रखा जाए तथा उससे यह अनुरोध किया जाए कि वह जल्द से जल्द इस मसले का समाधान ढूंढे।
साम्प्रदायिकताविरोधी खेमे के चन्द लोगों द्वारा उठायी गयी यह मांग कि ‘मौके को हाथ से नहीं जाने देना है’ ताकि सहयोग एवम समर्थन के नए युग की शुरूआत की जा सके, इसके पीछे उनके निहितार्थों को समझते हुए वह उन लोगों को इन झुण्डवादी ताकतों के वास्तविक इरादों के प्रति भी आगाह करना चाहता है।
हम हर अमनपसन्द, इन्साफ़पसन्द और अग्रगामी नज़रिया रखनेवाले व्यक्ति से अपील करना चाहते हैं कि वह विवेक की आवाज़ बुलन्द करे और धर्मनिरपेक्षता, जनतंत्र की हिफाज़त के लिए एकजुट होकर दीर्घकालीन संघर्ष चलाने की तैयारी करे।

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