‘बर्बरता के विरुद्ध’ नयी वेबसाइट पर
मित्रो,
हमने ‘बर्बरता के विरुद्ध’ के लिए नयी वेबसाइट बनायी है। आगे से हम उसी पर लेख वह अन्य सामग्री देंगे।
आप सभी लोग इस साइट को बुकमार्क कर सकते हैं साइट का यूआरएल है http://smashfascism.net/

‘बर्बरता के विरुद्ध’ नयी वेबसाइट पर
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| Photo Credit: AFP |
इस रिपोर्ट के मुताबिक, जिसके मुख्य लेखक वजाहत अलीने इस समूह को ”इस्लाम के प्रति घृणा फैलाने वाले नेटवर्क का केन्द्रीय स्नायुतंत्र” कहा है, ”आपस में बहुत करीबी ताल्लुकात रखने वाले ये व्यक्तिऔर संगठन मिलजुलकर ‘शरिया के फैलाव’, पश्चिम में इस्लामिक प्रभुत्व और कुरानद्वारा गैर-मुसलमानों के तथाकथित हिंसा के आह्वान के खतरे को पैदा करते हैं और उसेबढ़ा चढ़ा कर बताते हैं।”
आजादी की कथित दूसरी लड़ाई के मीडिया जनित महानायक अन्ना हजारे के आंदोलन की रूपरेखा बनाने से लेकर उसके सफल प्रबंधन एवं उसमें सक्रिय भागीदारी करने में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की भूमिका की पुष्टि हो चुकी है, इसलिए भ्रष्टाचार विरोधी इस गांधीवादी आंदोलन के साम्प्रदायिक चरित्र पर चर्चा करना जरूरी हो गया है। कोई भी आंदोलन संख्या बल में कितना ही विशाल क्यों न हो, उसके पीछे कौन सी ताकतें काम कर रही है तथा उनका मकसद क्या है, यह जाने बगैर उस आंदोलन का विश्लेषण अधूरा रह जाता हैं। कई दृष्टिकोणों और पहलुओं से अन्ना के अनशन व आंदोलन पर चर्चा की गई है, जैसे कि क्या यह गांधीवादी आंदोलन था? क्या यह पूर्णतः राजनीति निरपेक्ष आंदोलन था? क्या यह समाजवादी एवं लोकतांत्रिक आंदोलन था? क्या यह मीडिया द्वारा प्रायोजित था? क्या इसे कारपोरेट जगत ने वित्त पोषण दिया? क्या यह मात्र एक एनजीओ उपक्रम था? क्या यह पूरे भारत का आंदोलन था? इन सब बातों पर विस्तार से अलग-अलग लोगों ने अपने विचार व्यक्त किए है, मुझे लगता है कि इस बात की चर्चा कम हुई है कि क्या यह आंदोलन धर्म निरपेक्षता के संवैधानिक मूल्यों पर टिका था अथवा किसी खास विचारधारा की ओर झुका हुआ था? विशेषतः संघ विचार परिवार की ओर ?कात्यायनी की दो कविताएं
1.
आशवित्ज़ के बाद
कविता संभव नहीं रह गयी थी.
इसे संभव बनाना पड़ा था
शांति की दुहाई ने नहीं,
रहम की गुहारों ने नहीं,
दुआओं ने नहीं, प्रार्थनाओं ने नहीं,
कविता को संभव बनाया था
न्याय और मानवता के पक्ष में खडे होकर
लड़ने वाले करोडो नें अपने कुर्बानियों से.
लौह-मुष्टि ने ही चूर किया था वह कपाल
जहाँ बनती थी मानवद्रोही योजनाएँ
और पलते थे नरसंहारक रक्तपिपासु सपने.
गुजरात के बाद कविता सम्भव नहीं.
उसे संभव बनाना होगा.
कविता को सम्भव बनाने की यह कार्रवाई
होगी कविता के प्रदेश के बाहर.
हत्यारों की अभ्यर्थना में झुके रहने से
बचने के लिए देश से बाहर
देश-देश भटकने या कहीं और किसी गैर देश की
सीमा पर आत्महत्या करने को विवश होने से
बेहतर है अपनी जनता के साथ होना
और उन्हें याद करना जिन्होंने
जान बचाने के लिए नहीं, बल्कि जान देने के लिए
कूच किया था अपने-अपने देशों से
सुदूर स्पेन की ओर.
कविता को यदि संभव बनाना है २००२ में
गुजरात के बाद
और अफगानिस्तान के बाद
और फिलिस्तीन के बाद,
तो कविता के प्रदेश से बाहर
बहुत कुछ करना है.
चलोगे कवि-मित्रो,
इतिहास के निर्णय की प्रतीक्षा किये बिना ?
2.
भूतों के झुण्ड गुज़रते हैं
कुत्तों-भैसों पर हो सवार
जीवन जलता है कण्डों-सा
है गगन उगलता अन्धकार।
यूँ हिन्दू राष्ट्र बनाने का
उन्माद जगाया जाता है
नरमेध यज्ञ में लाशों का
यूँ ढेर लगाया जाता है।
यूँ संसद में आता बसन्त
यूँ सत्ता गाती है मल्हार
यूँ फासीवाद मचलता है
करता है जीवन पर प्रहार।
इतिहास रचा यूँ जाता है
ज्यों हो हिटलर का अट्टहास
यूँ धर्म चाकरी करता है
पूँजी करती वैभव-विलास।
रचनाकाल : अप्रैल, 2002
बिहार में नीतीश कुमार सरकार के ”सुशासन” की पूँजीवादी मीडिया में चारों ओर चर्चा है। लेकिन इसका असली चेहरा कितना ख़ूनी और बर्बर है यह उनकी पुलिस ने फार्बिसगंज में दिखा दिया। बिहार में नये आर्थिक और सामाजिक विकास की गाड़ी पर कौन सवार हैं और किसे रौंदती हुई यह आगे बढ़ रही है, यह भी इस घटना ने साफ़ कर दिया है।
पिछली 3 जून को अररिया ज़िले के फ़ार्बिसगंज मण्डल के भजनपुर गाँव में एक कारख़ाना मालिक की शह पर पुलिस ने इन्सानियत को शर्मसार करने वाला बर्बरता का ऐसा ताण्डव किया जिसकी मिसाल आज़ाद भारत में जल्दी नहीं मिलेगी। इस छोटे-से गाँव की लगभग पूरी आबादी मुस्लिम है और ज़्यादातर लोग आसपास के बाज़ार में और बड़े फ़ार्मरों के खेतों पर दिहाड़ी मज़दूर के रूप में काम करते हैं। 1984 में बिहार औद्योगिक क्षेत्रा विकास प्राधिकरण (बियाडा) ने गाँव की 105 एकड़ ज़मीन अधिग्रहीत की थी जिसमें अधिकांश गाँववालों की ज़मीन छिन गयी थी और बदले में उन्हें बहुत ही मामूली मुआवज़ा देकर टरका दिया गया था। इस गाँव को नज़दीकी मार्केट, ईदगाह, अस्पताल और कर्बला से जोड़ने वाली एकमात्र सड़क थी जो 1962 में बनायी गयी थी। लेकिन नीतीश सरकार के आदेश से बियाडा ने पिछले साल जून में इस सड़क सहित रामपुर और भजनपुर गांवों के बीच की सारी ज़मीन ऑरो सुन्दरम इण्टरनेशनल कम्पनी को मक्का से स्टार्च बनाने की फ़ैक्टरी स्थापित करने के लिए आवण्टित कर दी।
इस कम्पनी के डायरेक्टरों में से एक भाजपा के एम.एल.सी. अशोक अग्रवाल का बेटा सौरभ अग्रवाल भी है। बियाडा के इस निर्णय के विरोध में गाँव वालों ने एस.डी.ओ. को
अपना शिकायत पत्र सौंपकर सड़क बन्द न करने की अपील की थी, क्योंकि ऐसा होने पर दिहाड़ी पर खटने वाले इन मज़दूरों को रोज़ काम की तलाश में मार्केट तक पहुँचने के लिए 5-7 किलोमीटर की अतिरिक्त दूरी तय करनी पड़ती। मामले को सुलझाने के लिए 1 जून 2011 को कम्पनी अधिकारियों, प्रशासन और मुखिया समेत गाँववालों के बीच एक मीटिंग हुई थी जिसमें गाँववालों ने इस शर्त पर सड़क पर अपना अधिकार छोड़ने की लिखित रूप से हामी भर दी थी कि फ़ैक्टरी के दक्षिण की ओर से एक सड़क निकाल दी जाये। लेकिन अगले ही दिन 2 जून को कम्पनी ने भारी पुलिस बल की मौजूदगी में ईंट और कंक्रीट की दीवार बनाकर सड़क को बन्द कर दिया और पास का एक छोटा पुल भी ध्वस्त कर दिया। यह ख़बर गाँव में फैलते ही लोगों को लगा कि कम्पनी ने उनके साथ धोखा किया है और उनका गुस्सा फूट पड़ा। भजनपुर और रामपुर गाँव के निवासियों ने सड़क बन्द किये जाने के विरोध में प्रदर्शन करना शुरू कर दिया और कम्पनी द्वारा बनायी गयी दीवार को ढहा दिया। गाँववालों के इस तथाकथित उग्र प्रदर्शन को रोकने के लिए मौक़े पर मौजूद एस.पी. गरिमा मलिक ने प्रदर्शनकारियों पर सीधे फ़ायरिंग का आदेश दे दिया।
आदेश मिलते ही पुलिस ने निर्दोष गाँववालों को सबक़ सिखाने के लिए अपनी हैवानियत और वहशीपन का जो रूप दिखाया, उसके दृश्यों को देखकर रूह काँप
उठती है। पुलिस ने गाँववालों को उनके घरों तक खदेड़- खदेड़कर मारा। 18 वर्षीय मुस्तफ़ा अंसारी को पुलिस ने चार गोलियाँ मारीं जिससे वह मृतप्राय अवस्था में ज़मीन पर गिर पड़ा। लेकिन इतने से उनकी हैवानियत शान्त नहीं हुई। सुनील कुमार नाम का पुलिसवाला ज़मीन पर पड़े अधमरे मुस्तफ़ा के चेहरे पर कूद-कूदकर अपने पैरों से उसे कुचलने और अपने बूटों से उस पर पागलों की तरह प्रहार करने लगा जबकि वहाँ खड़े पुलिस वालों से लेकर प्रशासनिक अधिकारी तक सबके सब तमाशबीन की तरह देखते रहे। पुलिस फ़ायरिंग का शिकार दूसरा शख़्स मुख्तार अंसारी था जिसे सिर में तीन और एक गोली जाँघ में लगी। पगलाई पुलिस ने गर्भवती माँ और सात माह के बच्चे तक को नहीं बख्शा। 6 माह की गर्भवती शाज़मीन खातून को 6 गोलियों (चार सिर में) से छलनी करने के बाद पुलिस के एक सिपाही ने ज़मीन पर पड़ी लाश पर राइफ़ल की बट से वार कर उसके सिर को फाड़ डाला और उसका दिमाग़ बाहर आ गया। 7 माह के नौशाद अंसारी की दो गोलियाँ लगने से मौत हो गयी। इसके अलावा फ़ायरिंग में आधा दर्जन से भी अधिक लोग घायल हुए। मरनेवालों में सभी मुस्लिम थे। Continue Reading